(सूचना : यह विषय अधिवेशनमें भाषणके स्वरुपमे प्रस्तुत किया जाएगा |)
विषयप्रवेश
हमारे गुरु प.पू. डॉ. जयंत आठवलेजीने हिंदू राष्ट्रकी स्थापनाके विषयमें विविध अंगोंसे विचार किया है । उन्होंने ई.स. १९९९ में ‘ईश्वरीय राज्यकी स्थापना’ नामक ग्रंथकी रचना की । ई.स. २००० में दैनिक ‘सनातन प्रभात’ का प्रकाशन आरंभ हुआ, उस समय वे उसके प्रथम संपादक थे । उन्होंने सनातन प्रभातके रविवारके परिशिष्ठमें इस संदर्भमें एक लेखमाला प्रकाशित की थी, जिसका नाम था ‘ईश्वरीय राज्य’ अर्थात, ‘रामराज्य’, ‘आदर्श राज्य’ अर्थात आजकी भाषामें ‘हिंदू राष्ट्र’ । उससे ‘हिंदू राष्ट्र’की स्थापनाकी रूपरेखा ज्ञात हुई । उस रूपरेखाको सभीके समक्ष रखनेके लिए मैं यहां उपस्थित हुआ हूं ।
सारणी
- १. ‘हिंदू राष्ट्र’का अर्थ क्या है ?
२. ‘हिंदू राष्ट्र’की स्थापनाकी आवश्यकता
३. हिंदू राष्ट्रका संस्थापक कौन ?
४. धर्माचरणी हिंदू ही ‘हिंदू राष्ट्र’ स्थापित कर सकते हैं
५. हिंदू राष्ट्रकी स्थापनासे संबंधित कार्यके घटक
६. समग्र धर्मंक्रांति ही हिंदू राष्ट्रकी स्थापनाका अंतिम मार्ग !
७. हिंदू राष्ट्रकी स्थापनाकी समय-सूची
८. हिंदू राष्ट्रकी स्थापनाके स्वर्णिम पृष्ठ
१. ‘हिंदू राष्ट्र’का अर्थ क्या है ?
‘हिंदू राष्ट्र’की बात करें, तो उसे ‘हिंदुओंका राष्ट्र’ इस संकुचित दृष्टिसे देखा जाता है; परंतु कुछ लोगोंको तो ‘हिंदू राष्ट्र’ कहनेपर किसी राजनीतिक दलद्वारा प्रस्तुत दलीय संकल्पना प्रतीत होती है । किंतु ‘हिंदू राष्ट्र’की संकल्पना राजनीति नहीं; अपितु धर्माधारित तथा राष्ट्रनिष्ठ जीवन जीनेकी एक प्रगल्भ संस्कृति एवं व्यवस्था है । यह मानव, पशु-पक्षी, कीडे-मकोडे, वृक्ष एवं लता समान सूक्ष्मातिसूक्ष्म जीवोंके उद्धारका विचार करनेवाली एक ईश्वरसंकल्पित सामाजिक व्यवस्था है । इसलिए इसे ‘ईश्वरीय राज्य’ भी कहा जा सकता है । हमारे इस हिंदू राष्ट्रमें त्यागी एवं राष्ट्रोद्धारकी भावनासे ओतप्रोत धर्माचरणी समाज, कर्तव्यनिष्ठ सुरक्षाप्रबंध, सत्यान्वेषी न्यायप्रणाली, कार्यक्षम प्रशासन एवं सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह होगी कि इसमें धर्मनिष्ठा एवं राष्ट्रप्रेमसे युक्त समाजहितमें निःस्वार्थभावसे दिनरात कर्मयज्ञ करनेवाले शासक होंगे, जो इस ‘हिंदू राष्ट्र’के गौरवचिह्न होंगे । इसीलिए यह राज्य विश्वका एक ‘आदर्श राज्य’ होगा |
‘द्रष्टा दृश्यवशात् बध्यते ।’ (अर्थ : दृश्य दिखाई दे, तो ही द्रष्टा, अर्थात देखनेवाला उसके विषयमें विचार करता है), ऐसा सुभाषित है । ऐसेमें वर्तमान धर्मनिरपेक्ष, अर्थात ‘भ्रष्ट, स्वार्थलोलुप, जातिवादी एवं देशाभिमानशून्य’ राज्यप्रणालीद्वारा निर्मित प्रदूषणके कारण ‘हिंदू राष्ट्र’की तेजस्वी संकल्पना धूमिल हो गई है । जहां ‘हिंदू राष्ट्र’ अवतरित हो, वह ‘रामराज्य’ आज एक खोखली कल्पना बनकर रह गया है । छत्रपति शिवाजी महाराजद्वारा स्थापित ‘हिंदवी स्वराज्य’, अर्थात ‘हिंदू राष्ट्र’को विस्मृत करवाकर उसपर ‘समाजवादी राज्य’के नामपर ‘हरा रंग’ पोतनेका प्रयास किया जा रहा है । ‘हिंदू राष्ट्र अर्थात धर्मांधता’, यह दुष्प्रचार जानबूझकर किया जा रहा है । भूतकालीन ‘हिंदू राष्ट्र’का आदर्श लेकर, हम उनके उत्तराधिकारी, घोषणा करें कि आगामी कालमें एक संपन्न आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक ‘हिंदू राष्ट्र’की स्थापना करेंगे । यह काल अब अधिक दूर नहीं है । आनेवाले डेढ-दो दशकोंमें ही ‘रामराज्य’की झांकी दिखानेवाले ‘हिंदू राष्ट्र’की स्थापना होगी ।
यद्यपि ‘हिंदू राष्ट्रकी स्थापना होगी’, ऐसी आशा निर्माण करनेवाली कोई घटना नहीं दिखाई देती, ऐसेमें ‘हिंदू राष्ट्र’के विषयमें बात करना कुछ लोगोंको अतिशयोक्तिपूर्ण लग सकता है; परंतु कालकी गति पहचाननेवाले संतोंको उस उज्ज्वल कलकी आहट सुनाई देने लगी है । उस दिशामें प्रयत्न करना हमारी साधना अथवा धर्मकर्तव्य है ।
‘द्रष्टा दृश्यवशात् बध्यते ।’ (अर्थ : दृश्य दिखाई दे, तो ही द्रष्टा, अर्थात देखनेवाला उसके विषयमें विचार करता है), ऐसा सुभाषित है । ऐसेमें वर्तमान धर्मनिरपेक्ष, अर्थात ‘भ्रष्ट, स्वार्थलोलुप, जातिवादी एवं देशाभिमानशून्य’ राज्यप्रणालीद्वारा निर्मित प्रदूषणके कारण ‘हिंदू राष्ट्र’की तेजस्वी संकल्पना धूमिल हो गई है । जहां ‘हिंदू राष्ट्र’ अवतरित हो, वह ‘रामराज्य’ आज एक खोखली कल्पना बनकर रह गया है । छत्रपति शिवाजी महाराजद्वारा स्थापित ‘हिंदवी स्वराज्य’, अर्थात ‘हिंदू राष्ट्र’को विस्मृत करवाकर उसपर ‘समाजवादी राज्य’के नामपर ‘हरा रंग’ पोतनेका प्रयास किया जा रहा है । ‘हिंदू राष्ट्र अर्थात धर्मांधता’, यह दुष्प्रचार जानबूझकर किया जा रहा है । भूतकालीन ‘हिंदू राष्ट्र’का आदर्श लेकर, हम उनके उत्तराधिकारी, घोषणा करें कि आगामी कालमें एक संपन्न आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक ‘हिंदू राष्ट्र’की स्थापना करेंगे । यह काल अब अधिक दूर नहीं है । आनेवाले डेढ-दो दशकोंमें ही ‘रामराज्य’की झांकी दिखानेवाले ‘हिंदू राष्ट्र’की स्थापना होगी ।
यद्यपि ‘हिंदू राष्ट्रकी स्थापना होगी’, ऐसी आशा निर्माण करनेवाली कोई घटना नहीं दिखाई देती, ऐसेमें ‘हिंदू राष्ट्र’के विषयमें बात करना कुछ लोगोंको अतिशयोक्तिपूर्ण लग सकता है; परंतु कालकी गति पहचाननेवाले संतोंको उस उज्ज्वल कलकी आहट सुनाई देने लगी है । उस दिशामें प्रयत्न करना हमारी साधना अथवा धर्मकर्तव्य है ।
२. ‘हिंदू राष्ट्र’की स्थापनाकी आवश्यकता
वर्तमानमें धर्मनिरपेक्ष राज्यका जो स्तुतिगान हो रहा है, इसके विषयमें यह कहना पडेगा कि वह शासकोंके धर्मविषयक विपरीत समझके कारण अथवा अधर्मके कारण उनकी बुद्धि भ्रष्ट होनेके कारण है । आधुनिक भाषामें हम जिसे ‘राष्ट्ररचना’ कहेंगे, उसे संस्कृतमें ‘धर्मसंस्थापना’ कहा गया है । ऐसी धर्मसंस्थापना, अर्थात ‘हिंदू राष्ट्र’की स्थापना करना, वर्तमान स्थितिमें सभी दृष्टिसे आवश्यक है ।
२ अ. राष्ट्रीय समस्याओंकी दृष्टिसे
आज लाखो वर्ष व्यतीत होनेके पश्चात भी ‘रामराज्य’ लोगोंके स्मरणमें है; क्योंकि ‘रामराज्य’को धार्मिक आधार था । इसलिए उस समयके नागरिक सुसंस्कृत एवं सुखी-समाधानी थे । ‘श्रीरामके शासनकालमें कभी किसी भी स्त्रीको विलाप करते हुए नहीं सुना’ । ऐसे ‘रामराज्य’का वर्णन महर्षि वाल्मीकिने रामायणके ‘युद्धकांड’में किया है । आज भारतमें सर्वत्र धर्मनिरपेक्ष राज्य होनेके कारण सर्वत्र दुःख, दरिद्रता एवं दुराचार बढ रहा है । आतंकवाद, नक्सलवाद एवं अपराधियोंद्वारा निर्मित असुरक्षा, अन्य पंथियोंद्वारा हो रहा हिंदुओंका धर्म-परिवर्तन, देवालयोंका विध्वंस तथा हिंसाचार, शासनद्वारा हिंदुओंके साथ निम्न श्रेणीका बरताव, गांधीवादके आतंकवादसे हिंदुओंमें निर्मित घातक सर्वधर्म समभावका भय एवं आधुनिक विज्ञानद्वारा निर्मित प्रदूषणकी समस्या, ये भारतकी वर्तमान दुःस्थितिके कारण हैं । हिंदुओंको धार्मिक शिक्षा न मिलनेसे वे विकृत पश्चिमी संस्कृतिका अनुकरण करते हैं । हिंदुओंद्वारा ही हिंदू धर्मकी बडी हानि की जा रही है । देवभाषा संस्कृत तथा इससे उत्पन्न सात्त्विक प्रांतीय भाषाएं मृत्युशैय्यापर पडी हैं, आसुरी अंग्रेजी भाषाका गुणगान सर्वत्र हो रहा है । इस दुःस्थितिका कारण भारतीय राज्यप्रणालीका ‘धर्मनिरपेक्ष’, अर्थात ‘विधर्मी’ होना है । उसे सत्त्वगुणी हिंदू धर्मका आधार नहीं है । इसलिए राष्ट्रीय समस्या समाप्त करनेकी दृष्टिसे एक बार पुन: धर्माधारित राज्यप्रणालीकी स्थापना आवश्यक हो गई है ।२ आ. हिंदू राष्ट्रकी स्थापना हिंदुओंके लिए ही नहीं, अपितु संपूर्ण मानवजातिके लिए आवश्यक
‘हिंदू राष्ट्रकी स्थापना केवल हिंदुओंके लिए नहीं है, अपितु विश्वकी संपूर्ण मानवजातिके लिए है । हिंदू राष्ट्र अर्थात ‘आदर्श राष्ट्र’का लाभ भारतकी जनताको तो होगा ही; इससे विश्वमें धर्मप्रसार करना सुलभ होनेसे विश्वके मानवोंको अध्यात्म एवं साधना ज्ञात होकर उनकी भी आध्यात्मिक प्रगति होनेमें सहायता मिलेगी । इससे पृथ्वीपर सत्त्वप्रधान वातावरण निर्मित होकर सर्व मानव सुखी होंगे ।’२ इ. विश्वशांतिकी दृष्टिसे
सनातन हिंदू धर्म उच्चतम मूल्योंकी रक्षाका अमूल्य उपदेश देता है । यह धर्म सहिष्णु है । अतः, यह विश्वके लिए कल्याणकारी है । पृथ्वीपर रहना हो, तो हिंसाकी नहीं, सहिष्णुताकी आवश्यकता है । इसलिए हिंदू धर्मको बचाना आवश्यक है । हिंदू धर्म बचेगा, तो ही पृथ्वीपर सब जीवित रहेंगे । इससे संपूर्ण भारतमें शांति स्थापित होगी तथा विश्वशांतिका महान ध्येय साध्य होगा ।३. हिंदू राष्ट्रका संस्थापक कौन ?
३ अ. राष्ट्ररचना राजनीतिज्ञोंका काम नहीं
यह बात प्रथम मनपर अंकित कर लें कि सत्तापिपासु राजनीतिज्ञोंद्वारा ‘राष्ट्ररचना’ करना सर्वथा असंभव है; क्योंकि ‘राष्ट्ररचना’ एक शास्त्रीय प्रक्रिया है एवं उसमें केवल सत्यके लिए स्थान है । उसका विचार करते समय हम जिस अनुपातमें असत्य, अज्ञान इत्यादि दोषोंको जाने-अनजाने स्वीकार करेंगे, उस अनुपातमें यह रचना दुर्बल तथा अपूर्ण होगी । आधुनिक राजनीतिज्ञोंका मुख्य उद्देश्य सत्ता संपादन करना एवं अपनी सत्ताको बचाए रखना होता है । जो मनुष्य राज्यसत्ताको अपने वशमें करनेका विचार नहीं करता, वह राजनीतिज्ञ नहीं हो सकता । राष्ट्ररचना एवं राजनीतिमें आकाश-पातालका अंतर है । राष्ट्ररचनामें राज्यसत्ताका स्थान, हेतु एवं मर्यादा निर्धारित की जाती है ।४. धर्माचरणी हिंदू ही ‘हिंदू राष्ट्र’ स्थापित कर सकते हैं
४ अ. धर्माचरणका महत्त्व
राष्ट्ररचनाके इस कार्यमें परिस्थितिको समझनेके लिए एवं राष्ट्रहितमें दूरदृष्टिसे कार्य करनेके लिए व्यापक विश्लेषणात्मक बुद्धिकी आवश्यकता होती है । धर्माचरणके कारण अर्थात, आध्यात्मिक साधनासे विश्लेषणात्मक बुद्धिका विकास होता है । इसलिए, हिंदुत्वनिष्ठोंका धर्माचरणी बनना आवश्यक है ।४ आ. धर्माचरणी हिंदू ही खरे क्रांतिकारी
नैतिक (आध्यात्मिक) आदर्शकी ओर आकृष्ट होकर उस ओर दौड लगानेवाला हिंदू यदि शुद्ध नैतिक (आध्यात्मिक) जीवन व्यतीत करता है अर्थात धर्माचरणी है, तो वह खरे अर्थोंमें क्रांतिकारी है । क्रांति करनेके इच्छुक नेताओंमें एवं उनके अनुयायियोंमें वास्तविक नैतिक (आध्यात्मिक) प्रेरणा हो, तो ही वे क्रांति कर सकते हैं । तात्पर्य यह है कि आधुनिक क्रांतिवादियोंको धर्माचरणी जीवन जीनेकी प्रेरणा मिले, तो ही हिंदू राष्ट्रकी स्थापनाकी धर्मक्रांति सफल होगी ।५. हिंदू राष्ट्रकी स्थापनासे संबंधित कार्यके घटक
५ अ. धर्मशिक्षा
हिंदुओंको धर्मशिक्षा देनेपर वे धर्माचरणी बनेंगे । धर्माचरणसे उन्हें अनुभूति होगी । अनुभूतियोंसे धर्मश्रद्धा बढेगी । धर्मश्रद्धासे धर्माभिमान बढेगा । धर्माभिमानसे हिंदूसंगठन दृढ होगा । संगठित हिंदुओंके कारण ही निर्भयताका वातावरण निर्मित होगा तथा इस वातावरणमें ही हिंदू राष्ट्रका उदय एवं उसका पोषण होगा । सारांश यह है कि धर्मशिक्षा ही हिंदू राष्ट्रकी स्थापनाकी नींव है ।५ आ. राष्ट्र एवं धर्मके विषयमें जागरण
विविध माध्यमोंसे हिंदू धर्म एवं राष्ट्रकी हो रही हानिका महत्त्वपूर्ण कारण है, हिंदू समाजका जाग्रत न होना । जबतक हिंदू समाजमें राष्ट्र एवं धर्मकी दुःस्थिति अथवा हानिके विषयमें जागृति उत्पन्न नहीं होगी, तबतक यह समाज राष्ट्र एवं धर्मके विषयमें संवेदनशील नहीं बनेगा । हिंदू समाजका जो वर्ग राष्ट्र एवं धर्मके प्रति संवेदनशील नहीं है, वह हिंदू राष्ट्रकी स्थापनामें योगदान नहीं दे सकता । इसलिए हमें हिंदू समाजका प्रबोधन प्रभावी ढंगसे करना है ।५ इ. राष्ट्र एवं धर्मकी रक्षा
जाग्रत हिंदू समाज राष्ट्र एवं धर्मकी रक्षाका कार्य स्वयंप्रेरणासे करता है । देशके छोटे-बडे हिंदुत्वनिष्ठ संगठन शारीरिक स्तरपर तथा विचारक एवं हिंदुत्ववादी नियतकालिक वैचारिक स्तरपर राष्ट्र एवं धर्मकी रक्षाका कार्य कर रहे हैं । यह कार्य अकेले ही करनेसे विशेष लाभ नहीं होगा । संगठित प्रयास ही अधिक प्रभावी होंगे । विविध हिंदुत्ववादी संगठनोंकी प्रधानता भिन्न-भिन्न हो सकती है, उदा. गंगा नदीका शुद्धीकरण, गोरक्षा अभियान इत्यादि । हिंदू धर्म एवं राष्ट्रकी हानिका मूल कारण अधर्मी शासक हैं । अतः राष्ट्र एवं धर्मकी रक्षाके लिए राष्ट्रद्रोही एवं धर्मद्रोही राजनीतिक दलोंकी जडपर प्रहार कर हिंदू राष्ट्र स्थापित करना हमारा अंतिम ध्येय होना चाहिए । ऐसा होनेपर हमें हिंदू धर्मकी प्रत्येक समस्याका समाधान ढूंढनेके लिए माथापच्ची नहीं करनी पडेगी, समाधान अपनेआप ही निकलता जाएगा ।५ ई. सामाजिक सहायता
हिंदू संगठनोंद्वारा सामाजिक सहायताके कार्यक्रम करनेकी क्या आवश्यकता है, ऐसा हममेंसे कुछको लग सकता है, तो कुछ ऐसे उपक्रम करते ही होंगे ।१. हमें समाजका संगठन करना है, तो समाजका विश्वास संपादन करना पडेगा । उसके लिए समाजके सुख-दुःखोंसे तथा समस्याओंसे समरस होना एवं लोगोंकी सहायता करना आवश्यक है ।
२. हम हिंदुत्वनिष्ठ हैं, तो भी व्यक्ति अथवा संगठनके रूपमें हिंदू समाजका एक घटक हैं । इसलिए समाजके लिए कुछ करना हमारा कर्तव्य है । किंतु, हम समाजके लिए जो कार्यक्रम चलाएं, उनसे भी धर्मजागृति तथा हिंदूहितोंकी रक्षा हो, इस दृष्टिसे प्रयत्न होने चाहिए । सामाजिक सहायता करनेकी दृष्टिसे हम प्राथमिक उपचार प्रशिक्षण, देवालयोंकी स्वच्छता, ग्रामस्वच्छता, निःशुल्क चिकित्सा शिविर लगाना इत्यादि कार्यक्रम कर सकते हैं । ऐसे कार्यक्रम हिंदुत्वके लिए अधिकाधिक पोषक होंगे । जब हिंदू राष्ट्रकी स्थापनाका आवश्यक क्रांतिपर्व आरंभ होगा, तब यही समाज हमारे पीछे शक्ति बनकर खडा रहेगा, इतना अधिक महत्त्व सामाजिक सहायता कार्यक्रमको है ।
६. समग्र धर्मंक्रांति ही हिंदू राष्ट्रकी स्थापनाका अंतिम मार्ग
आप क्रांतिकारी विचारोंके हों अथवा शांतिवादी, आप विचारशील हों अथवा कृत्यशील, विधिज्ञ हों अथवा अनभिज्ञ, एक दिन ऐसा अवश्य आएगा कि हिंदू राष्ट्रकी स्थापनाके लिए हम सबको क्रांति करनी पडेगी अथवा क्रांतिको प्रोत्साहन देना पडेगा । इसका कारण, लोकतंत्रके सत्तापिपासु कभी भी हमारे हाथोंमें अपनेआप सत्ता नहीं सौंपेंगे । यह हमें क्रांतिके मार्गसे ही संपादन करना पडेगा । उचित समयपर यह राष्ट्रव्यापी क्रांति करनी पडेगी । यहां कालानुसार आचरणको अत्यंत महत्त्व है । मध्यमें कुछ हिंदुत्वनिष्ठोंने काल अनुकूल न होनेपर भी विस्फोट कर क्रांति आरंभ करनेका प्रयास किया था । किंतु, काल प्रतिकूल होनेके कारण उनका श्रम व्यर्थ गया । आज भी ये लोग कारागृहमें पडे हैं । आज वे बाहर होते, तो बडे स्तरपर कार्य कर रहे होते । धर्मक्रांतिके इस युद्धमें हमें क्रांतिकारीके रूपमें मरना नहीं है, अपितु राष्ट्र और धर्मकी सेवा कर मोक्ष प्राप्त करना है । ‘क्रांति’ शब्दका अर्थ, सुराज्यके लिए परिवर्तनकी भावना एवं आकांक्षा है । क्रांतिका अर्थ केवल बमविस्फोट अथवा हिंसाचार नहीं, अपितु यह समाजमें एक ही समय उत्पन्न होनेवाली मानसिक परिवर्तनकी प्रक्रिया है । ‘क्रांति’ मनुष्यका छीना न जा सकनेवाला अधिकार है । बमविस्फोट करना, यह अकेले-दुकेलेका किया हुआ क्रांतिका प्रयत्न संवैधानिक दृष्टिसे राष्ट्रद्रोह होता है । किंतु, लाखों लोगोंद्वारा संपूर्ण देशमें एक ही समय किया हुआ आंदोलन देशकी दृष्टिसे ‘राज्यक्रांति’ होता है । हमें ऐसी क्रांतिका वातावरण पूरे देशमें निर्माण करना है ।
६ अ. धर्मक्रांति, अर्थात केवल क्रांति नहीं, अपितु उत्क्रांति
क्रांति किसी झंझावातके समान आती है तथा अपनी लपेटमें सबकुछ, अर्थात पुराने नीतिमूल्य, पुरानी वृत्ति-प्रवृत्ति, पुराने संस्था-संगठन आदिको ध्वस्त कर जाती है । वह निर्माणकी अपेक्षा विध्वंस ही अधिक करती है । हमें ऐसी क्रांति अभिप्रेत नहीं है । भारतीय इतिहास और परंपरासे ज्ञात होता है कि हमारा भावविश्व क्रांतिकी अपेक्षा उत्क्रांतिके लिए तथा जीवनकी अपेक्षा पुनरुज्जीवनके लिए अधिक अनुकूल है, अधिक सुसंगत है । क्रांति और उत्क्रांतिमें, जीवन और पुनरुज्जीवनमें मौलिक अंतर यह है कि उत्क्रांति और पुनरुज्जीवन जीवनाधारित होते हैं । ये जीवन अथवा अन्य कुछ भी ध्वस्त नहीं करते, अपितु उनका उद्धार करते हैं । कलियुगसे सत्ययुगमें प्रवेशको हम ‘उत्क्रांति’ कहते हैं, अर्थात जब ‘रामराज्य’ अर्थात, ‘धर्माधारित हिंदू राष्ट्र’ स्थापित होगा, तभी हमारी उत्क्रांति पूरी होगी ।’७. हिंदू राष्ट्रकी स्थापनाकी समय-सूची
| वर्ष | कार्य | |
| अ. | २०१२ से २०१५ (४ वर्ष) | हिंदू राष्ट्रकी स्थापना हेतु हिंदू-संगठन |
| आ. | २०१६ से २०१९ (४ वर्ष) | संगठित हिंदुओंकी सहायतासे समग्र धर्मक्रांति |
| इ. | २०२० से २०२२ (३ वर्ष) | धर्माधारित राज्यकारोबारका प्रशिक्षण |
| ई. | २०२३ से २०२५ (३ वर्ष) | हिंदू राष्ट्रकी प्रत्यक्ष स्थापना |
८. हिंदू राष्ट्रकी स्थापनाके स्वर्णिम पृष्ठ
हिंदू संगठनोंके नेताओं एवं कार्यकर्ताओंको, हिंदू राष्ट्रकी स्थापनाके प्रक्रियाकालमें, ‘हिंदू राष्ट्र हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है तथा इसे हम प्राप्त करके ही रहेंगे !’, ऐसी गर्जना करनी चाहिए । हिंदू राष्ट्र स्थापित करनेके लिए हमारे साथ कोई नहीं है, यह विचार कर हमें रुकना नहीं है । हमसे जितना बन पाए, उतने प्रयत्न करते रहना है । उसके लिए स्मरण कीजिए और गुनगुनाइए निम्नांकित काव्यपंक्तियोंको -
अर्थात, ‘यदि तुम्हारी पुकार सुनकर तुम्हारा साथ देने कोई न आए, तो तुम अकेले ही बढते रहना’, यह रवींद्रनाथ ठाकुरकी काव्यपंक्तिका सूत्र सदैव ध्यानमें रखें । ‘आओगे, तो तुम्हारे साथ, नहीं आओगे, तो तुम्हारे बिना और बाधक बनोगे, तो तुम्हें रौंदते हुए हम अपने कर्तव्य मार्गपर चलते ही रहेंगे’, यह प्रतिज्ञा करनेवाले स्वातंत्र्यवीर सावरकरकी भांति हिंदू राष्ट्रकी स्थापनाकी दुर्दम्य इच्छाशक्ति हममें जाग्रत होनी चाहिए । कालानुसार हिंदू राष्ट्रकी स्थापना होगी, यह अटल सत्य है । इसके लिए आवश्यक आध्यात्मिक युद्ध सनातन संस्था समान आध्यात्मिक संस्थाएं कर रही हैं । ऐसा होते हुए भी, यह ऐतिहासिक कार्य हिंदू संगठनोंके माध्यमसे होनेवाला है । अतः, अपना संगठन अधिकाधिक सशक्त बनानेके लिए सबको अपना-अपना क्रियमाण कर्म करना पडेगा । इस अधिवेशनके माध्यमसे हिंदू राष्ट्र-स्थापना हेतु आवश्यक धर्मक्रांतिका बीज हिंदू संगठनोंके मनमें बोया जा सके तथा उनके माध्यमसे धर्माधारित हिंदू राष्ट्रकी स्थापनाका स्वर्णिम पृष्ठ लिखा जाए, यह भगवान श्रीकृष्णके चरणोंमें प्रार्थना है ! प्रणाम !
| ‘जदी तोर डाक शुने केउ ना आसे । तोबे एकलो चोलो रे एकलो चोलो ।।’ - रवींद्रनाथ ठाकुर |
अर्थात, ‘यदि तुम्हारी पुकार सुनकर तुम्हारा साथ देने कोई न आए, तो तुम अकेले ही बढते रहना’, यह रवींद्रनाथ ठाकुरकी काव्यपंक्तिका सूत्र सदैव ध्यानमें रखें । ‘आओगे, तो तुम्हारे साथ, नहीं आओगे, तो तुम्हारे बिना और बाधक बनोगे, तो तुम्हें रौंदते हुए हम अपने कर्तव्य मार्गपर चलते ही रहेंगे’, यह प्रतिज्ञा करनेवाले स्वातंत्र्यवीर सावरकरकी भांति हिंदू राष्ट्रकी स्थापनाकी दुर्दम्य इच्छाशक्ति हममें जाग्रत होनी चाहिए । कालानुसार हिंदू राष्ट्रकी स्थापना होगी, यह अटल सत्य है । इसके लिए आवश्यक आध्यात्मिक युद्ध सनातन संस्था समान आध्यात्मिक संस्थाएं कर रही हैं । ऐसा होते हुए भी, यह ऐतिहासिक कार्य हिंदू संगठनोंके माध्यमसे होनेवाला है । अतः, अपना संगठन अधिकाधिक सशक्त बनानेके लिए सबको अपना-अपना क्रियमाण कर्म करना पडेगा । इस अधिवेशनके माध्यमसे हिंदू राष्ट्र-स्थापना हेतु आवश्यक धर्मक्रांतिका बीज हिंदू संगठनोंके मनमें बोया जा सके तथा उनके माध्यमसे धर्माधारित हिंदू राष्ट्रकी स्थापनाका स्वर्णिम पृष्ठ लिखा जाए, यह भगवान श्रीकृष्णके चरणोंमें प्रार्थना है ! प्रणाम !
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