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सारणी
- १. श्रीकृष्णतत्त्वसे संबंधित रंगोली
- २. श्रीकृष्ण तत्त्वसे संबंधित रंगोली एवं उसकी विशेषताएं
- ३. रंगोली देखते ही प्राचीन विविध कालचक्रोंका लय होकर नवीन कालचक्रकी रचना एवं रंगोलीके स्थानपर साक्षात श्रीकृष्णका अस्तित्व प्रतीत होना
- ४. श्रीकृष्णकी पूजाविधिमें अंतर्भूत कृत्योंका शास्त्राधार
- ५. भगवान श्रीकृष्णजीके पूजनमें कृष्णकमल एवं तुलसीके उपयोगका कारण
१. श्रीकृष्णतत्त्वसे संबंधित रंगोली
सनातन हिंदू धर्ममें अनेक त्यौहार हैं । उस दिन वातावरणमें त्यौहारसे संबंधित विशिष्ट देवताका तत्त्व प्रचुर मात्रामें कार्यरत रहता है । इस तत्त्वका लाभ अधिकसे अधिक होने हेतु प्रयास किए जाते हैं । विशिष्ट देवतातत्त्वको आकृष्ट करने हेतु विशिष्ट प्रकारकी रंगोली बनानेसे लाभ होता है । श्रीकृष्ण जन्माष्टमीके दिन श्रीकृष्ण तत्त्वसे संबंधित रंगोली बनाना अत्यंत लाभकारी होता है । सनातन संस्थाके साधकोंने संतोंके मार्गदर्शनानुसार श्रीकृष्ण तत्त्वसंबंधी रंगोलीकी रचना एवं उसमें भरने योग्य रंगोंका अभ्यास किया ।
२. श्रीकृष्ण तत्त्वसे संबंधित रंगोली एवं उसकी विशेषताएं
यह रंगोली श्रीकृष्णतत्त्व आकृष्ट करती है । आकृतिमें बताए अनुसार यह रंगोली १३ से ७ क्रमांककी बिंदुओंको जोडकर बनाई जाती है । इससे आनंदकी अनुभूति होती है । श्रीकृष्ण पूर्णावतार हैं, इसलिए उनमें सभी देवताओंके तत्त्व आते हैं । इस कारण श्रीकृष्णतत्त्व आकृष्ट करनेवाली रंगोली किसी भी मंगल कार्यक्रममें बना सकते हैं ।
३. रंगोली देखते ही प्राचीन विविध कालचक्रोंका लय होकर नवीन
कालचक्रकी रचना एवं रंगोलीके स्थानपर साक्षात श्रीकृष्णका अस्तित्व प्रतीत होना
पू. (डॉ.) चारुदत्त पिंगळे
श्रीकृष्णतत्त्वकी रंगोलीका चित्र देखनेसे महाराष्ट्रके पू. (डॉ.) चारुदत्त पिंगळेजी इनको हुई बोधप्रद अनुभूति । १९ अक्तूबर २००६ के दैनिक `सनातन प्रभात'में श्रीकृष्णतत्त्वकी रंगोलीका चित्र छपा था । उसे देखतेही उसमें बने वर्तुलोंके मध्यकी रिक्तियोंसे श्वेत प्रकाशका प्रवाह मेरी ओर आता मुझे दिखाई दिया । रंगोलीके सर्व ओरके वर्तुल बीचके वर्तुलकी ओर आकर उसमें विलीन होते दिखाई दिए । बीचके वर्तुलसे अनेक वर्तुल प्रक्षेपित होते प्रतीत हुए । मुझे प्रतीत हुआ जैसे प्राचीन विविध कालचक्रोंका लय होकर नए कालचक्रकी रचना हुई है । इस चित्रके नीचे लिखा था - `श्रीकृष्णतत्त्व आकृष्ट करनेवाली रंगोली' । उसे पढनेपर उस रंगोलीके चित्रद्वारा परमात्माका अर्थात साक्षात श्रीकृष्णका अस्तित्व प्रतीत होनेका आनंद मुझे मिला । पू. (डॉ.) पिंगळेजी इनको श्रीकृष्णतत्त्वसे संबंधित रंगोली देखकर भगवान श्रीकृष्णजीके अस्तित्वका भान हुआ । इसीसे उस रंगोलीका महत्त्व स्पष्ट होता है ।
४.१ श्रीकृष्णपूजन करनेसे पूर्व स्वयंको मध्यमासे भू्रमध्यपर
आज्ञा-चक्रके स्थानपर विष्णुसमान दो खडी रेखाओंवाला तिलक लगानेका शास्त्रीय आधार
श्रीकृष्णपूजनसे पूर्व दो खडी रेखाओंवाला तिलक लगाया जाता है । यह तिलक विशेषकर वैष्णव अर्थात भगवान श्रीविष्णुके उपासक लगाते हैं । श्रीकृष्णपूजनसे पूर्व उपासक श्रीविष्णुतत्त्वसे संबंधित खडा भरा हुआ तिलक भी लगा सकते हैं । सामान्यतः श्रीकृष्णपूजनमें गोपीचंदनका उपयोग किया जाता है । इसे `विष्णुचंदन' भी कहते हैं । यह द्वारकाके क्षेत्रमें पाई जानेवाली एक विशेष प्रकारकी श्वेत मिट्टी है । जैसे गंगामें स्नान करनेसे पाप धुल जाते हैं, उसी प्रकार गोपीचंदनका लेप लगानेसे सर्व पाप नष्ट होते हैं । विष्णु गायत्रीका उच्चारण करते हुए मस्तकपर गोपीचंदन लगानेकी प्रथा है ।
५. भगवान श्रीकृष्णजीके पूजनमें कृष्णकमल एवं तुलसीके उपयोगका कारण
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पूजामें जो वस्तु जिस देवताको अर्पण की जाती है, वह उस देवताको भाती है, ऐसी मान्यता है । उदाहरणके रूपमें गणपतिको लाल पुष्प, शिवजीको बेल, श्रीकृष्णको तुलसी इत्यादि । वास्तवमें उच्च देवताओंकी कोई रुचि-अरुचि नहीं होती है । विशिष्ट वस्तु अर्पण करनेका कुछ अध्यात्मशास्त्रीय आधार होता है । पूजाका उद्देश्य है, `पूजाकी मूर्तिमें चैतन्य जागृत हो तथा पूजकको उसका लाभ हो । यह चैतन्य जागृत होने हेतु उस देवताको विशिष्ट वस्तु अर्पित की जाती है, जैसे श्रीकृष्णजीको कृष्णकमल एवं तुलसी चढाते हैं । इन वस्तुओंमें श्रीकृष्णजीके महालोकतकके सूक्ष्मातिसूक्ष्म कण अर्थात पवित्रक आकृष्ट करनेकी क्षमता होती है । इसीलिए श्रीकृष्णजीको कृष्णकमलके पुष्प एवं तुलसी अर्पण करनेसे श्रीकृष्णजीकी प्रतिमामें विद्यमान चैतन्यका लाभ पूजकको शीघ्र प्राप्त होता है । कृष्णकमलमें श्रीकृष्णजीकी तत्त्वतरंगें अधिक मात्रामें आकृष्ट होती हैं तथा ये तत्त्वतरंगें कृष्णकमलके पुष्पोंसे पवित्रकोंके रूपमें प्रक्षेपित भी होती हैं, इनकी तुलनामें अन्य वस्तुओंमें यह क्षमता अल्प मात्रामें होती है । श्रीकृष्णजीको पुष्प तीन अथवा तीनकी मात्रामें तथा लंबगोलाकार अर्थात एलिप्टिकल आकारमें चढानेसे उन पुष्पोंकी ओर कृष्णतत्त्व शीघ्र आकृष्ट होता है । देवतापूजनमें उपयोगमें लाई जानेवाली वस्तुएं किस प्रकारकी होनी चाहिए, उनके माध्यमसे संबंधित देवताका तत्त्व अधिकाधिक मात्रामें किस प्रकार प्राप्त कर सकते हैं, इन बातोंका गहन विचार करनेवाले सनातन हिंदु धर्मकी महानताका शब्दोंमें वर्णन करना कठिन है ।
(संदर्भ : सनातनका ग्रंथ-त्यौहार, धार्मिक उत्सव एवं व्रत)
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