पूना, १९ जुलाई (वार्ता.) – प्रस्तावित ‘सांप्रदायिक एवं लक्ष्यित हिंसा अधिनियम २०११’ यह ‘हिंदुओंके लिए कायदा एवं अल्पसंख्यांकोंको फायदा’ इस स्वरूपका कानून है । इस कानूनकी धाराएं, धर्मके आधारपर विभाजन कर अल्पसंख्यकोंकी रक्षा एवं हिंदुओंको बंदीगृहमें डालनेवाली हैं ।
‘मेंटल हॅरॅसमेंट’ जैसे शब्दोंका की व्याख्या भी इस कानूनमें स्पष्ट नहीं किया गया है । इस कानूनके अनुचित प्रयोगसे हिंदु संत समाप्त होने एवं हिंदुत्ववादी संगठनोंपर दबाव आनेकी संभावना है । इसीलिए इस कानूनके विरोधमें व्यापक स्तरपर जनजागृति होना आवश्यक है, ऐसा ‘सिटीजन्स फॉर इक्वेलिटी एण्ड जस्टीस फोरम’ के श्री. हेमंत पारसनीस ने प्रतिपादित किया । इस कानूनके संदर्भमें ‘वर्तक आश्रम’ में हाल हीमें आयोजित भाषणमें वे बोल रहे थे ।
श्री. पारसनीसने आगे कहा,‘‘केवल दंगल जैसी परिस्थितिमें ही नहीं, बल्कि किसी भी क्षण हिंदु इस कानूनके घेरेमें आ सकते हैं । अतः हिंदुओंके अभिव्यक्ती स्वतंत्रतापर आंच आनेवाली है; परंतु दुर्दैवकी बात यह कि इस विषयमें अधिकांश हिंदु बंधु अपरिचित हैं । प्रत्येक भारतीयकी रक्षा करनेकी अपेक्षा यह कानून केवल अल्पसंख्यकोंकी रक्षाके लिए निर्माण होनेवाला है ।
‘भारतीय दंडविधान’ के अनुसार वर्तमान समयमें जो कानून अस्तित्वमें हैं, वे दंगल रोकनेके लिए सक्षम हैं, अतःनए कानूनोंकी आवश्यकता नहीं । इसीलिए इस हिमायती कानूनको अत्यधिक मात्रामें विरोध होना चाहिए ।’’ इस कानूनके अनुचित प्रयोगसे हिंदुओंको अपराधी ठहराकर बंदीगृहमें डाला जाएगा इसलिए शासनने अभी बंदीगृहोंकी संख्यामें वृद्धि करना चाहिए, ऐसी उपरोधिक सूचना भी उन्होंने शासनको दी । इस समारोहमें समर्थभक्त पू. सुनील चिंचोलकर उपस्थित थे । व्याख्यानके अंतमें कृतज्ञता व्यक्त करते समय डॉ. प.वि. वर्तकने केवल ‘सनातन प्रभात’ एवं ‘सामना’ जैसे समाचारपत्र ही ऐसे घटनाओंको प्रसारित करते हैं, यह कहकर इन समाचार पत्रोंपर विश्वास व्यक्त किया ।
यह कानून प्रसारित न होने हेतु यह निश्चित करें …
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१. जनता एवं लोकप्रतिनिधियोंको मिलकर इस कानूनके दुष्परिणामोंसे उन्हें अवगत कराएं ।
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२. निम्न पतेपर पत्र अथवा संगणकीय पत्र भेजकर राष्ट्रप्रेमी एवं धर्मप्रेमी जागरुक नागरिक विरोध अंकित कर रहे हैं ।
संगणकीय पता : [email protected]
शासनको पत्र भेजनेका पता : सेक्रेटरी, नॅशनल अॅडवायजरी कॉन्सील,
मोतीलाल नेहरू प्लेस, अकबर रोड,नई दिल्ली – ११० ०११ -
३. शासनके संकेतस्थलपर यह कानून केवल हिंदी एवं अंग्रेजी भाषाओंमें उपलब्ध है । उसका भाषांतर अनेक प्रादेशिक भाषाओंमें करने हेतु उसपर प्रतिक्रिया भेजनेका अवधि बढानेके लिए शासनको बाध्य करें ।
स्रोत : Dainik Sanatan Prabhat