सारिणी
- १. ब्रह्मांडमें गंगा नदीकी उत्पत्ति एवं भूलोकमें उनका अवतरण
- २. गंगाजीकी भौगोलिक एवं भौतिक विशेषताएं
- ३. प्राचीन आरोग्यशास्त्रमें वर्णित गंगाजलका महत्त्व
- ४. गंगाजलमें नित्य शुद्ध (ताजा) रहनेकी क्षमता
- ५. गंगास्नानकी महिमा
गंगा नदी उत्तर भारतकी केवल जीवनरेखा नहीं, अपितु हिंदू धर्मका सर्वोत्तम तीर्थ है । ‘आर्य सनातन वैदिक संस्कृति’ गंगाके तटपर विकसित हुई, इसलिए गंगा हिंदुस्थानकी राष्ट्ररूपी अस्मिता है एवं भारतीय संस्कृतिका मूलाधार है । इस कलियुगमें श्रद्धालुओंके पाप-ताप नष्ट हों, इसलिए ईश्वरने उन्हें इस धरापर भेजा है । वे प्रकृतिका बहता जल नहीं; अपितु सुरसरिता (देवनदी) हैं । उनके प्रति हिंदुओंकी आस्था गौरीशंकरकी भांति सर्वोच्च है । गंगाजी मोक्षदायिनी हैं; इसीलिए उन्हें गौरवान्वित करते हुए पद्मपुराणमें (खण्ड ५, अध्याय ६०, श्लोक ३९) कहा गया है, ‘सहज उपलब्ध एवं मोक्षदायिनी गंगाजीके रहते विपुल धनराशि व्यय (खर्च) करनेवाले यज्ञ एवं कठिन तपस्याका क्या लाभ ?’ नारदपुराणमें तो कहा गया है, ‘अष्टांग योग, तप एवं यज्ञ, इन सबकी अपेक्षा गंगाजीका निवास उत्तम है । गंगाजी भारतकी पवित्रताकी सर्वश्रेष्ठ केंद्रबिंदु हैं, उनकी महिमा अवर्णनीय है ।’
१. ब्रह्मांडमें गंगा नदीकी उत्पत्ति एवं भूलोकमें उनका अवतरण
१ अ. ‘गंगा’ शब्दकी व्युत्पत्ति एवं अर्थ
गमयति भगवत्पदम् इति गङ्गा ।
अर्थ : गंगा वे हैं जो (स्नान करनेवाले जीवको) ईश्वरके चरणोंतक पहुंचाती हैं ।
गम्यते प्राप्यते मोक्षार्थिभिः इति गङ्गा ।
अर्थ : जिनकी ओर मोक्षार्थी अर्थात मुमुक्षु जाते हैं, वही गंगाजी हैं ।
१ अा. गंगाजीके कुछ अन्य नाम
अ. ब्रह्मद्रवा : ब्रह्मदेवने गंगाजीको अपने कमंडलुमें धारण किया इसलिए उन्हें ‘ब्रह्मद्रवा’ कहते हैं ।
आ. विष्णुपदी अथवा विष्णुप्रिया : गंगाजीके विष्णुपदको स्पर्श कर भूलोकमें अवतरित होनेसे उन्हें ‘विष्णुपदी’ अथवा ‘विष्णुप्रिया’ नाम प्राप्त हुए ।
इ. भागीरथी : राजा भगीरथकी तपस्याके कारण गंगा नदी पृथ्वीवर अवतीर्ण हुईं; इसलिए उन्हें ‘भागीरथी (भगीरथकी कन्या)’ कहते हैं ।
ई. जाह्नवी : ‘हिमालयसे नीचे उतरते समय गंगाजी अपने साथ राजर्षि एवं तपस्वी जह्नुऋषिकी यज्ञभूमि बहा ले गईं । इस बातसे क्रोधित होकर जह्नुऋषिने उनके संपूर्ण प्रवाहका प्राशन कर लिया । तत्पश्चात जब भगीरथने जह्नुऋषिसे प्रार्थना की, तब उन्होंने गंगाजीके प्रवाहको अपने एक कानसे बाहर छोडा । इससे वे ‘जाह्नवी (जह्नुऋषिकी कन्या)’ कहलाने लगीं ।’ (वायुपुराण, अध्याय ९१, श्लोक ५४ से ५८)
उ. त्रिपथगा : ‘भूतलपर अवतरित होनेके पश्चात गंगाजीकी धाराको शिवजीने अपनी जटामें थाम लिया । उस समय उनके तीन प्रवाह हुए । इन प्रवाहोंमेंसे पहला स्वर्गमें गया, दूसरा भूतलपर रह गया तथा तीसरा पातालमें बह गया; इसलिए उन्हें ‘त्रिपथगा’ अथवा ‘त्रिपथगामिनी’ कहते हैं ।’
ऊ. गंगाजीके त्रिलोकमें नाम : गंगाजीको स्वर्गमें ‘मंदाकिनी’, पृथ्वीपर ‘भागीरथी’ तथा पातालमें ‘भोगावती’ कहते हैं ।
ए. ‘गैंजेस्’ – पाश्चात्योंद्वारा दिया गया विकृत नाम : ग्रीक, अंग्रेजी आदि यूरोपीय भाषाओंमें गंगाका उच्चारण विकृतरूपसे अर्थात ‘गैंजेस्’ ऐसा किया जाता है । आंग्लदासताकी मानसिकता रखनेवाले भारतीय भी इसी नामसे उच्चारण करते हैं । ‘शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध तथा उनसे संबंधित शक्तियां एकत्रित होती हैं’, यह अध्यात्मशास्त्रीय सिद्धांत है । ‘गंगा’ शब्दका अनुचित पद्धतिसे उच्चारण करनेवालोंको गंगाजीके स्मरणका आध्यात्मिक लाभ कैसे प्राप्त होगा ? इसीलिए विदेशी भाषामें बोलते एवं लिखते समय उन्हें ‘गंगा’के नामसे ही संबोधित करें !
१ इ. ब्रह्मांडमें उत्पत्ति
१ ई. भूलोकमें अवतरण
१ ई १. भगीरथजीकी कठोर तपस्याके कारण गंगाजीका पृथ्वीपर अवतरित होना एवं सगरपुत्रोंका उद्धार करना
१ ई २. गंगाजीके भूलोकपर अवतरित होनेका दिन !
दशमी शुक्लपक्षे तु ज्येष्ठे मासि कुजेऽहनि ।
अवतीर्णा यतः स्वर्गात् हस्तर्क्षे च सरिद्वरा ।। – वराहपुराण
२. गंगाजीकी आध्यात्मिक एवं भौतिक विशेषताएं
२ अ. आध्यात्मिक एवं भौतिक विशेषताएं
२ अ १. पापविनाशिनी
‘गंगाजी ‘दशहरा’ हैं । वे शारीरिक, वाचिक एवं मानसिक पापोंसे युक्त निम्न दस पापोंका हरण करती हैं ।
अ. वाचिक पाप : १. चोरी, २. हिंसा एवं ३. परस्त्रीगमन
आ. शारीरिक पाप : कठोर वचन, झूठ (असत्य) बोलना, चुगली अथवा निंदा करना तथा असंबद्ध, अकारण बडबडाना (वृथावल्गना)
इ. मानसिक पाप : परापहार (दूसरोंका धन हडपनेका विचार मनमें आना), अनिष्टिंचतन (मनसे दूसरोंका अनिष्ट चिंतन करना) एवं दुराग्रह (झूठा अभिनिवेश होना)’ – गुरुदेव डॉ. काटेस्वामीजी (‘गंगा पापविनाशिनी है, इसलिए चाहे जितने पाप कर एक गंगास्नानसे निपटा लो’, ऐसा नहीं होता, अपितु पापके विषयमें मनमें तीव्र खेद प्रतीत होना, तथा ‘वैसा पाप पुनः हमसे नहीं होगा’, इस विषयमें सतर्कता रखनेकी गंभीरता उत्पन्न होना आवश्यक है । – संकलनकर्ता)
ई. पापस्मृतियोंसे मुक्ति : ‘एक मतके अनुसार गंगाजी पापोंसे नहीं; अपितु पापोंकी स्मृतियोंसे मुक्त करती हैं ।’ – डॉ. वसंत आठवले (वर्ष १९९०)
२ अ २. पवित्रतम
समस्त नदियोंमें पवित्र नदी : भारतकी सात पवित्र नदियोंमेंसे गंगाजी प्रथम, अर्थात पवित्रतम नदी हैं । जिस पदार्थमें अलौकिक सत्शक्ति अथवा पुण्य होता है, वह पदार्थ पवित्र होता है । पवित्र पदार्थके अल्पातिअल्प अंशमें भी संपूर्ण पदार्थकी भांति ही पवित्रता होती है, उदा. गंगाजलकी एक बूंद भी संपूर्ण गंगाकी भांति ही पवित्र होती है । ‘गंगा नदीमें आध्यात्मिक गंगाजीका अंशात्मक तत्त्व है, इसलिए प्रदूषणसे वे कितनी भी अशुद्ध हो जाएं, उनकी पवित्रता सदासर्वकाल बनी रहती है; इसीलिए ‘विश्व के किसी भी जलसे तुलना करनेपर गंगाजल सबसे पवित्र है’, ऐसा सूक्ष्म-ज्ञानकी क्षमता रखनेवालोंको ही नहीं अपितु (पंचज्ञानेंद्रिय, मन एवं बुद्धिका उपयोग किए बिना कुछ ज्ञात होना, इसे ‘सूक्ष्मकी समझ’ कहते हैं । जैसे-जैसे साधना करनेसे आध्यात्मिक स्तर बढता है, वैसे-वैसे सूक्ष्म स्तरीय समझ बढती है ।) वैज्ञानिकोंको भी प्रतीत होता है ।’ ‘अस्वच्छ’ एवं ‘अपवित्र’ ये शब्द समानार्थी नहीं हैं । ‘स्वच्छ’ एवं ‘अस्वच्छ’ ये शब्द शरीर अथवा भौतिकशास्त्रसे संबंधित हैं, जबकि ‘पवित्र’ एवं ‘अपवित्र’ ये शब्द अध्यात्मशास्त्रसे संबंधित हैं । अतः कोई वस्तु अस्वच्छ होते हुए भी पवित्र हो सकती है । वर्तमान समयमें गंगाजल इसी प्रकारमें समाविष्ट है । इसलिए इस जलसे रोग हो सकते हैं; परंतु उसमें विद्यमान सत्त्वगुणका लाभ होता है । तब भी स्वच्छ एवं पवित्र जल ही सर्वोत्तम होता है ! गंगाजल स्वयं पवित्र है एवं अन्योंको भी पवित्र करता है । गंगाजलका प्रोक्षण किसी भी व्यक्ति, वस्तु, वास्तु अथवा स्थानपर करनेसे वे वस्तुएं पवित्र हो जाती हैं ।
२ अ ३. सर्वश्रेष्ठ तीर्थ
गंगानदी पृथ्वीतलका सर्वश्रेष्ठ तीर्थ है ।
गङ्गासदृशं तीर्थं न देवः केशवात् परः ।
ब्राह्मणेभ्यः परं नास्ति एवमाह पितामहः ।।
– महाभारत, पर्व ३, अध्याय ८३, श्लोक ९६
अर्थ : गंगाजीसमान तीर्थ नहीं, विष्णुसमान देवता नहीं, ब्राह्मणसे कोई श्रेष्ठ नहीं, ऐसा ब्रह्मदेवने कहा ।
‘सत्ययुगमें सभी स्थान पवित्र थे । त्रेतायुगमें ‘पुष्कर’, जबकि द्वापरयुगमें ‘कुरुक्षेत्र’ सभी तीर्थोंमें पवित्र तीर्थ था तथा कलियुगमें गंगाजी परमपवित्र तीर्थ हैं ।
गंगाजीमें अन्यत्र कहीं भी स्नान करनेसे गंगाजी कुरुक्षेत्रकी भांति (द्वापरयुगमें सरस्वती नदीके तटपर कुरुक्षेत्र नामक पवित्र तीर्थ था ।) पवित्र हैं; परंतु हरद्वारके कनखल तीर्थकी विशेषता कुछ भिन्न है । प्रयाग तीर्थकी महिमा तो उससे भी अधिक है । सैकडों पापकर्म किया व्यक्ति भी जब कनखल तीर्थमें गंगाजलसे स्नान करता है, तो गंगाजल उस व्यक्तिके पापोंका नाश उसी प्रकार करता है, जिस प्रकार अग्नि इंधनका नाश करती है । (महाभारत, पर्व ३, अध्याय ८३)
२ आ. भौतिक विशेषताएं
२ आ १. जीवनदायिनी : हिमालय पर्वतकी गंगोत्रीमें उद्गम पानेवाली २,५१० कि.मी. लंबी गंगा नदी गंगासागरमें (बंगालके उपसागरमें)लुप्त होती हैं । इस मार्गमें वह करोडों भारतीयोंको जलकी पूर्ति करती हैं, धरतीका ताप दूर करती हैं, फसलें उगाती हैं एवं श्रद्धालुओंको गंगास्नानका आस्वाद प्रदान करती हैं; अतः गंगा नदी ‘जीवनदायिनी’ हैं ।
२ आ २. आरोग्यदायिनी : ‘औषधं जाह्नवीतोयम् ।’ अर्थात ‘गंगाजल ही वास्तविक औषधि है’, ऐसा कहा गया है । ‘विजयनगरके राजा कृष्णदेवराय जब वर्ष १५२५ में मरणासन्न अवस्थामें थे, उस समय उन्हें गंगाजल दिया गया । तत्पश्चात वे पुनः जीवन जीनेयोग्य बने ।’ (संदर्भ : ‘विजयनगर : थर्ड डायनेस्टी’, १९३५)
२ आ ३. वनौषधियुक्त जल : हिमालयमें उत्पन्न विभिन्न औषधि वृक्ष तथा जडी-बूटियां गंगाजलको औषधीय गुणोंसे युक्त करती हैं । जैसे बकायन, गुंज (घुंघची), खस, द्रोणपुष्पी, कंटकारी (भटकटैया, वैज्ञानिक नाम सोलेनम जैंथोकार्पम), सहदेवी (वेरनोनिया सिनेरिया), देवदार, अडहुल, सोनपाठा, नीलगिरी, पाषाणभेद (गंगोत्रीसे टिहरीतक पाया जाता है ।) अपराजिता (गोकर्ण), दारूहल्दी (दारूहरिद्रा), कुटज, घृतकुमारी (एलोवेरा), जलजमनी (गारुडी), लाजवंती (छुईमुई) (मिमोसा), मधुमालती, नागदामिनी, पित्तपापडा (वॉटर विलो), वासा (अडूसा), सर्पगंधा, ब्राह्मी, मकोय (काकमाची) ऐसे सैकडों औषधीय वनस्पति गंगा परिसरमें पाए जाते हैं । इससे उनके सार (सत्व) मनुष्यके प्रत्येक रोगपर उपचार हेतु उपयुक्त सिद्ध होते हैं । इसलिए गंगाजीको `आरोग्यदायिनी नदी’ कहते हैं ।
२ आ ४. प्राणवायुसंपन्न जल : गंगाजीके जलकी भौतिक, रासायनिक, जैविक एवं जैव रासायनिक (फिजीकल, केमिकल, बायोलॉजिकल एवं बायोकेमिकल) अवस्थाओंका अध्ययन करनेपर ऐसा पाया गया, कि वर्षा ऋतुके अतिरिक्त शेष कालमें अन्य नदियोंके जलकी तुलनामें गंगाजीके जलमें २५ प्रतिशत अधिक प्राणवायु (ऑक्सीजन) होती है ।
३. प्राचीन आरोग्यशास्त्रमें वर्णित गंगाजलका महत्त्व
३ अ. गंगाजल
हिमवत्प्रभवाः पथ्याः पुण्या देवर्षिसेविताः ।
– चरकसंहिता, सूत्रस्थान, अध्याय २७, श्लोक २०९
अर्थ : देव तथा ऋषियोंके स्पर्शसे पावन हुआ एवं हिमालयसे उद्गमित नदियोंका जल, विशेषकर गंगाजल स्वाथ्यकारी अर्थात आरोग्यके लिए हितकारी है ।
यथोक्तलक्षणहिमालयभवत्वादेव गाङ्गं पथ्यम् ।
– चक्रपाणिदत्त (वर्ष १०६०)
अर्थ : हिमालयसे प्रवाहित गंगाजल औषधि (रोगीके लिए हितकारी) है ।
३ आ. गंगाजलके नित्य सेवनसे प्राप्त स्वास्थ्यप्रद लाभ
अ. ‘गंगाजलके नित्य सेवनसे शरीरकी रोगप्रतिकारक शक्ति बढती है ।
आ. अपच, जीर्ण ज्वर, संग्रहणी, आंव, दमा आदि रोग भी धीरे-धीरे नष्ट होते हैं ।
इ. गंगाजलमें घाव भरनेका सामर्थ्य है ।
ई. ‘मल्टीड्रग रेसिस्टेंट’ (MDR) अर्थात विविध प्रकारकी औषधियोंसे प्रभावित न होनेवाले रोगीकी स्थिति शुद्ध गंगाजलके प्राशनसे अच्छी होती है ।
३ ई. जलप्रदूषणनाशिनी
‘उत्तराखंडके रुडकी विश्वविद्यालयमें डॉ. भार्गव के नेतृत्वमें विशेषज्ञोंने देहरादूनसे वाराणसीतकके गंगाजल, यमुनाजल एवं उन क्षेत्रोंके वातावरणीय प्रदूषणका शोध किया । इस शोधसे उन्हें निम्न निष्कर्ष प्राप्त हुए ।
अ. गंगाजलमें सामान्यतः ३० से ६० मिनटोंमें विषाक्त रासायनिक कूडेका ७० प्रतिशत प्रदूषण दूर होता है । दिल्लीमें यमुना जलका शोध करनेपर ऐसा पाया गया कि वह ७० प्रतिशत रासायनिक विष दूर करता है, जबकि वाराणसीमें बहनेवाली गंगानदीका जल ८० प्रतिशत विष दूर करता है । प्रदूषणसे जलमें प्राणवायु घुलनेकी मात्रा अत्यल्प हो जाती है; परंतु गंगायमुनाका जल विलक्षण गतिसे प्राणवायुकी न्यूनता दूर करता है, ऐसा पाया गया है । रुडकी विश्वविद्यालयके उपरोक्त निष्कर्ष दर्शानेवाला ब्यौरा अमेरिकाके ‘स्टेट्समैन’ नामक विश्वविख्यात नियतकालिकमें १.१२.१९८१ को प्रकाशित हुआ । गंगाजलके प्रति हिंदुओंमें विद्यमान इस श्रद्धाका क्रूर उपहास करनेवाले वैज्ञानिकोंको क्या यह सत्य ज्ञात है ?’ – गुरुदेव डॉ. काटेस्वामीजी
३ उ. कीटाणुनाशक क्षमता
कॉलराकी (हैजा – एक महामारी) ही भांति प्लेग आदि रोगोंके कीटाणु भी गंगाजलमें जीवित नहीं रह सकते, यह सत्य प्रयोगद्वारा सिद्ध हुआ है । गंगाजीकी कीटाणुनाशक क्षमताके विषयमें कुछ वैज्ञानिकोंके अनुभव आगे दे रहे हैं ।
अ. मार्क ट्वेनद्वारा वैज्ञानिकोंकी सहायतासे किया गया मूल्यांकन ! : ‘सुप्रसिद्ध अमेरिकी विचारक एवं चलचित्र अभिनेता मार्क ट्वेनने अपने ‘फॉलोइंग दि इक्वेटर’ इस यात्रावर्णनमें गंगाजलका वैज्ञानिक मूल्यांकन किया है । इसे उन्हींके शब्दोंमें आगे दे रहे हैं । ‘‘१८९६ में आगरा पहुंचनेपर वहां एक अविस्मरणीय वैज्ञानिक शोध हुआ । वह शोध यह था, कि जिसकी हम अवहेलना करते हैं, उस गंगाका कुछ मात्रामें गंदा जल विश्वका सबसे बडा प्रभावी कीटाणुनाशक एवं शुद्धिकारक है ।
आ. मि. हेन्किन नामक वैज्ञानिकने वाराणसी जाकर वहांका गंगाजल प्रयोगशालामें जांचा । उन्होंने गंगा-घाटपर, जहां निकासीका जल मिश्रित होता है, वहांका गंदा जल लिया । एक लीटरके सहस्त्रांश भागमें उन्हें लाखों कीटाणु दिखाई पडे; परंतु ६ घंटे पश्चात उनमेंसे एक भी कीटाणु शेष नहीं था ।
इ. तत्पश्चात वे एक तैरता हुआ शव तटपर खींचकर लाए एवं उसके आसपासका जल जांचा । उसमें हैजेके लाखों कीटाणु पाए गए; परंतु ६ घंटे पश्चात उनमेंसे एक भी कीटाणु शेष नहीं था । इस जलमें उन्होंने पुनः-पुनः हैजेके असंख्य कीटाणु डाले; परंतु वे सभी ६ घंटोंमें निर्जीव हो गए । इसके पश्चात कुएंका स्वच्छ एवं कीटाणुरहित जल लाया गया । उसमें जब हैजेके कीटाणु डाले, तो वे शीघ्रतासे बढने लगे । ६ घंटे उपरांत उनकी संख्या अनेक गुना बढ गई ।’ प्राचीनकालसे हिंदू गंगाजीका जल पवित्र मानते आए हैं । उनकी दृढ धर्मश्रद्धा है कि गंगाजल अत्यंत शुद्ध होता है, वह कभी दूषित (अपवित्र) नहीं होता एवं जो उसके संपर्कमें आता है, वह शुद्ध हो जाता है । इन हिंदुओंका आजतक हमने उपहास किया; परंतु अब गंभीरतासे विचार करना अनिवार्य हो गया है । इस जलका रहस्य उन्हें इतने प्राचीन कालमें कैसे ज्ञात हुआ ? क्या उस कालमें उनके पास सूक्ष्म-कीटाणु विशेषज्ञ थे ? परंतु एक बात हम जानते हैं और वह बात यह है, कि जिस प्राचीन कालमें हम पश्चिमी आदिम अवस्थासे बाहर निकल ही रहे थे, उस कालके भी बहुत पहले इन हिंदुओंकी उच्च संस्कृति थी ।’’ – मार्क ट्वेन (संदर्भ : ‘दैनिक महाराष्ट्र टाइम्स’, १९.१.१९८१, पृष्ठ ४, लेखक : धुंडिराज ना. वैद्य, कल्याण.)
४. गंगाजलमें नित्य शुद्ध (ताजा) रहनेकी क्षमता
४ अ. कुछ वैज्ञानिकोंके निष्कर्ष
अ. हैजेके रोगाणुओंसे दूषित गंगाजलमें लाखों लोग स्नान करते हैं एवं उन्हें रोग (हैजा) नहीं होता, यह बडा चमत्कार है ।’ – एफ्.सी. हैरिसन, शोधकर्ता, मैगील विश्वविद्यालय, कैनडा
आ. ‘गंगा नदीके जलमें जिस प्रकारकी रोगाणुनाशक शक्ति है, वैसी शक्ति विश्वकी किसी भी नदीके जलमें नहीं पाई गई ।’ – कोहीमान, जलतत्त्व विशेषज्ञ (इ.स. १९४७ में वाराणसीमें गंगाजलपर शोध करनेपर घोषित निष्कर्ष)
४ आ. नित्य शुद्ध (ताजा) रहनेकी क्षमता
शुद्धिकरण क्षमताके कारण भी गंगाजी विश्वविख्यात हैं । इस शुद्धिकरण क्षमताका वैज्ञानिक आधार है । गंगा नदीमें ‘बैक्टीरियोफेज’ नामक विषाणु होते हैं एवं वे अन्य जीवाणु तथा अन्य हानिकारक सूक्ष्म- जीवोंको नष्ट करते हैं ।
‘लंदनके डॉ. सी.एल्. नेल्सन (एफ्.आर्.सी.एस्.) ने गंगाजीके नित्य शुद्ध रहनेकी क्षमताके विषयमें विलक्षण अनुभव बताया । वे कहते हैं, ‘`हुगली (कोलकाता) गंगाजीका सागरसे मिलनेवाला मुख है । यहांका गंगाजल अत्यंत गंदा होता है । कोलकातासे इंग्लैंड जानेवाली नौकामें रखा गंगाजल लंदन पहुंचनेतक नित्य शुद्ध (ताजा) ही रहता है, जबकि इंग्लैंडसे मुंबई पहुंचनेतक नौकामें विविध सागरोंसे आनेवाला जल शुद्ध (ताजा) नहीं रहता, वह बासी हो जाता है ।’’ (इंग्लैंडके लिए मुंबईकी सर्वाधिक निकटका बंदरगाह है । मुंबईसे कोलकाता जानेके लिए एक सप्ताह लगता है । तब भी ऐसा होता है !)’- गुरुदेव डॉ. काटेस्वामीजी
५. गंगास्नानकी महिमा
५ अ. गंगाद्वार, प्रयाग तथा गंगासागर संगमपर गंगास्नानकी महिमा
सर्वत्र सुलभा गङ्गा त्रिषु स्थानेषु दुर्लभा ।
गङ्गाद्वारे प्रयागे च गङ्गासागरसङ्गमे ।।
तत्र स्नात्वा दिवं यान्ति ये मृतास्तेऽपुनर्भवाः ।।
(गरुडपुराण, अंश १, अध्याय ८१, श्लोक १ एवं २)
अर्थ : भूतलपर अवतरित होनेके उपरांत पूर्वसागरमें लुप्त होनेतक गंगाजी सर्वत्र सुलभ हैं, तब भी गंगाद्वार, प्रयाग तथा गंगासागर संगमपर वे दुर्लभ हैं । यहां स्नान करनेवाले स्वर्ग प्राप्त करते हैं एवं देह त्यागनेवालोंका पुनर्जन्म टल जाता है ।
५ आ. गंगास्नानसे पावन होनेके लिए यात्रियोंमें खरा भाव आवश्यक !
‘एक बार काशीके महान तपस्वी शांताश्रमस्वामीजी एवं ब्रह्मचैतन्य गोंदवलेकर महाराजजीमें निम्न वार्तालाप हुआ ।
स्वामी : महाराज, लोग काशीमें गंगास्नान करते हैं, तो भी वे पावन क्यों नहीं होते ?
गोंदवलेकर महाराज : क्योंकि उनमें खरा भाव नहीं होता !
स्वामी (उत्तर अस्वीकार होनेसे) : खरा भाव न होता, तो वे आते ही क्यों ?
गोंदवलेकर महाराज : यह बात शीघ्र ही सिद्ध करूंगा । चार दिन पश्चात गोंदवलेकर महाराजजीने शांताश्रमस्वामीजीके हाथ-पैरोंमें चिंधियां लपेटकर उन्हें महारोगीका रूप दिया । जहां अनेक लोग गंगास्नानके लिए आते थे, वहां ले जाकर उन्हें बिठा दिया । महाराजजी स्वयं बैरागीका वेश धारण कर उनके समीप खडे रहे । कुछ ही समयमें अनेक लोग इकट्ठे हो गए । बैरागीने उपस्थित लोगोंसे विनती की, ‘‘भइया, सुनिए ! यह महारोगी मेरा भाई है । गत वर्ष हम दोनोंने विश्वेश्वरजीकी अत्यंत मनःपूर्वक सेवा की । तब उन्होंने प्रसन्न होकर मेरे भाईको वर प्रदान किया, ‘जिस यात्रीका ऐसा भाव हो कि इस गंगाजीमें स्नान करनेपर मेरे पाप नष्ट होकर मैं शुद्ध हो गया हूं’, वह यदि तुम्हें एक बार भी आलिंगन दे, तो तुम्हारा रोग नष्ट हो जाएगा ।’ यहांपर आप इतने लोग हैं, कोई तो मेरे भाईपर इतना उपकार कीजिए !’’
बैरागीकी विनती सुनकर भीडमेंसे ८-१० लोग आगे बढे । उसी क्षण बैरागीने उन लोगोंको रोककर कहा, ‘‘क्षणभर रुकिए ! विश्वेश्वरजीने आगे ऐसा भी कहा है, ‘जो यात्री इसे आलिंगन देगा, वह रोगसे संक्रमित हो जाएगा; परंतु गंगाजीमें पुनः शुद्ध भावसे स्नान करनेपर वह रोगमुक्त होगा ।’ ऐसा बतानेपर सब लोग चले गए; परंतु वहांके एक युवा किसानने अधिक विचार न कर, निष्ठापूर्वक गंगास्मरण कर शांताश्रमस्वामीजीको गले लगाया । तत्पश्चात तुरंत गोंदवलेकर महाराजजीने स्वयं उस किसानको गले लगाते हुए कहा, ‘‘बेटा, तुम्हारी काशीयात्रा वास्तवमें सफल हुई । तुम्हारे जन्मका कल्याण हुआ, यह निश्चितरूपसे जान लो !’’ शांताश्रमस्वामीजीको इस प्रसंगका अर्थ अपनेआप ही समझमें आ गया !’ (संदर्भ : श्री. बेलसरेलिखित ‘श्रीब्रह्मचैतन्य गोंदवलेकर महाराज चरित्र एवं वाङ्मय’)